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preetimishra


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माँ

Posted On: 9 May, 2011  
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……और वह कुर्बान हो गया.

Posted On: 23 Feb, 2011  
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प्यार कल और आज/ valentine contest

Posted On: 12 Feb, 2011  
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प्रेम का प्रदर्शन/valentine contest

Posted On: 4 Feb, 2011  
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आधुनिकता की परिभाषा

Posted On: 31 Jan, 2011  
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हिन्दुस्तानी

Posted On: 27 Jan, 2011  
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सफलता

Posted On: 12 Jan, 2011  
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खुदी को कर बुलंद इतना कि हर…

Posted On: 4 Jan, 2011  
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दुल्हन ही दहेज है

Posted On: 21 Dec, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

के द्वारा:

प्रीती जी, आपका यह लेख बहुत सुन्दर है और आपके विचारों से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ| यही तो इस देश की विडंबना है| माँ जैसे उदात्त व्यक्तित्व को एक अदना से 'मदर्स डे' तक सीमित किया जा रहा है| पाश्चात्य सभ्यता से आयातित इस तरह के निरर्थक दिवस हे दृष्टि से देखे जाने लायक हैं| हमारे लिए तो हमारी माँ हमेशा हमारे साथ हैं, हमारी यादों में, हमारे ख़्वाबों में, हमारे जज़्बों में, हमारे हर एक पल में, हर एक सांस में| माँ न होती तो हम कहाँ होते, कुछ और ही होते हम| हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व, एक एक सांस, खून की एक एक बूँद, शरीर का एक एक अंग सब माँ की ही देन है, इस सच को कोई भी झुठला नहीं सकता| हमारे लिए तो हर दिन 'मदर्स डे' है| आभार आपका,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

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आदरणीय प्रीति जी..... वास्तव मे इस देश को बांटने वाले जिन बातों को आधार बनाते है उनको हम आँख मूँद कर मान लेते हैं....... एक बार भी उसपर गौर नहीं करते......... रामलीला मे मुस्लिम कारीगरों के हाथ से बने पुतले रामलीला के मंचन की शोभा बढाते हैं..... ओर हम उनसे ही बनवाते है.... क्योकि हमें भी पता है की वो इस कला मे माहिर हैं........ मो. रफ़ी साहब ने न जाने कितने भजन अपनी आवाज मे गाकर उनको मंदिरों की प्रार्थना मे शामिल करवाया....... तो क्या उन भजनो से भगवान की महत्ता कम हो गयी........... हमारी सोच ही है जो ये सारा फसाद करवाती है......... गलत का विरोध होना ही चाहिए...... फिर चाहे वो अपने धर्म का कोई करे या दूसरे धर्म का ........ पर कोई गैर धर्म का किसी काम को कर रहा है इसलिए वो काम गलत है..... इस तरह की धारणा को हटाना होगा........ अच्छा लेख........ बधाई....

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

के द्वारा: preetimishra preetimishra

प्रीति जी आपने बिलकुल सही लिखा जब हम मैच देखते हैं तो खिलाड़ी की प्रशंशा यह देखकर नहीं करते की उसकी जाति क्या है उसका धर्म क्या है, इसी प्रकार जब हम फिल्म देखते हैं तब भी इसका भेद नहीं करते, मगर फिर भी इस मुल्क मैं धर्म का भेद बहुत ज्यादा है ! मेरा मानना तो ये है की दुनिया मैं सिर्फ दो प्रकार के इन्सान होते हैं अच्छे और बुरे और अच्छाई और बुराई का धर्म से कोई लेना देना नहीं ! वैसे आपने फिल्मो की बात की है तो मुझे नाना पाटेकर का एक डायलोग याद आ रहा है " जो लोग गीता बाइबल कुरान पढ़कर नहीं जागे वे लोग आपका ब्लॉग पढ़कर क्या जागेंगे " किन्तु प्रयास करना अपना कार्य है और आपकी राय से हम पूरी तरह इत्तेफाक रखते हैं ! अच्छे लेख पर बधाई !

के द्वारा: allrounder allrounder

राजकमलजी आपके पिताजी की मृत्यु के बारे में जानकर अत्यंत दुःख हुआ. पिता की मृत्यु के बाद यदि बेटा बड़ा हो तो उस पर बहुत अधिक जिम्मेदारी आ जाती है और वह समय से पहले बड़ा हो जाता है.चूंकी पिता एवं बच्चों में उम्र में एक पीढ़ी का अंतर होता है इसलिए बच्चे बड़े भाई की तुलना में पिता की बात ज्यादा आसानी से मानते हैं. इस स्थिती में भी आपको धैर्य से काम लेते हुए अपने छोटे भाई-बहनों कों समझाना चाहिए कि हमारे ऊपर अब और जिम्मेदारी आ गयी है और इस जिम्मेदारी कों हमें मिल-जुल कर निभाना है.इस समय जो भी आपका काम है जैसे कि पढाई वह अच्छी से अच्छी तरह करना है.वह वैसे ही जिस पिता की कमी का एहसास करतें होंगे.इस कमी कों आपको अपने प्यार से भरना चाहिए. प्यार के साथ-साथ उनको जिम्मेदार भी बनाइये. उनसे टाइम-टेबल बनाने कों कहें जिसमे पढाई, खेल का समय निर्धारित हो.फॉलो करने पर उनको पुरस्कृत भी करें. जीवन कों सरल बनाने का एक उपाए कम्यूनीकेशन भी है.अपने भाई-बहन के दोस्त बनिए. कोई भी समस्या हो उनको अवगत कराएं और सुझाव मांगे.अंतिम फैसला आपके हाथ में ही होना चाहिए. उनसे पूछिए कि उनके जीवन का क्या लक्ष्य है, उनको अपनी लाइफ में क्या बनना है? वह जो भी बनना चाहते हैं उसके लिए वह क्या-क्या प्रयास कर रहे है.उनको सुझाव दें कि मेरे विचार से यह काम यदि ऐसे किया जाये तो ज्यादा अच्छा होगा. अपने विचार उन पर थोपे नहीं.

के द्वारा:

आप की अति उपयोगी पोस्‍ट पर जोडना चाहता हूं -  * मार्ग दर्शक-संरक्षक समेत मां-बाप की सभी भूमिकायें निबाहने के साथ ही बच्‍चों का सर्व प्रिय- सर्वश्रेष्‍ठ दोस्‍त बनें। *पांचवीं-छठीं नहीं कम से कम हाई स्‍कूल तक बच्‍चे का स्‍वाभाविक विकास होने दें। उसमें सहायक ही बनें, उसकी दिशा निर्धारक नहीं। प्राथमिकता दें कि बच्‍चा ही अपनी स्‍वाभाविक दिशा तय कर सके। *मोटी कमाई, आईएएस-आईपीएस वगैरह बनने को ही सफल होना नहीं कहा जा सकता। श्रेष्‍ठ मानवीय गुणों-संस्‍कारों के बिना पानी वाले बादल जैसी स्थिति हो जाती है। सफल से भी अधिक महत्‍वपूर्ण है सार्थक जीवन, इस भाव बोध का अंकुरण बच्‍चे को बडा बनाएगा। *छोटे बच्‍चों के सामने पति-पत्‍नी कभी झगडे न करें। बच्‍चे के विकास में मां-बाप के ब्‍यवहार का सर्वाधिक असर पडता है। उन्‍हें कुछ कहने से ज्‍यादा। बच्‍चा सामान्‍यत: अपनी मां में संसार की सर्वर मां और पिता में सर्वश्रेष्‍ठ पिता का ही अक्‍श देखना चाहता है। इस लिए दंम्‍पतियों को स्‍वयं के आचरण-ब्‍यवहार के प्रति पूरी तरह सजग रहना चाहिए।

के द्वारा:

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 अध्‍यात्‍म उद्देश्‍य की उदात्‍तता से  विशुद्ध विज्ञान है।  इसमें उद्देश्‍य सिर्फ परमात्‍मप्राप्ति या लोक कल्‍याण ही होता है। अध्‍ययन-अनुसंधान दृष्टि से अध्‍यातम विज्ञान है, इससे सहमत हुआ जा सकता है। पारमार्थिक उद्देश्‍य अध्‍यात्‍म को महनीय बनाता है।श्‍वास की गति को रोकना-टालना यदि विज्ञान समर्थ हो सका तो, भी अल्‍प कालिक ही सकता है। सदैव के लिए नहीं , क्‍यों कि विज्ञान की शक्ति-गति भी ससीम-सीमित है। अध्‍यात्‍म कहता है कि अनंत, अनादि असीम परमेश्‍वर भी सीमाओं में बंधा है। यही उसका पूर्णत्‍व है।  गुह का विचार मंथन-  सुख सरूप रघुबंशमनि मंगलवार मोद निधान, सो सोवत कुस डज्ञथ्‍श्र महि बिधि गति अति बलवान। यह बिधि गति ,उसी का खेल, ही ससीमता है। कृष्‍ण कहते हैं, अर्जुन अब अगर तुम मुझ से दुबारा बताने को कहो तो उसी तरह बता पाना मेरे लिए संभव न होगा, क्‍यों कि उस समय मैंने योगस्‍थ होकर कहा था। नहिवक्‍तुमशेशत: - यह भगवान की विवशता उनकी सीमा ही है। अपने खेल-जाल में बंधा हुआ। ज्ञान हो या विज्ञान हम जो पहले से है उसी को जान-खोज पाते हैं।नया कुछ नहीं। हम जेा सोचते हें वह पहले से सोचा जा चुका है।जो करते हें पहले से किया जा चुका है। वैज्ञानिक तत्‍व की खोज तो करते रहे लेकिन हस्‍तगत तत्‍वों का आश्रय लिये बिना किसी नए तत्‍व का स्रजन नहीं कर पाए हैं। कागज के टुकडे को भी नष्‍ट करने की स्थिति नहीं बन पायी है। जलाने पर उसका रूप ही विभिन्‍न अवयवों में रूपांतरित हो जाता है। हमारी सांस हमारे वश में नहीं है। जन्‍म और कदाचित मृत्‍यु भी, वश में नहीं है। कर्म कैसे वश में है या कर्म करने को हम स्‍वतंत्र कैसे हैं ? फिर भगवान शंकर को - उमा कहउं मैं अनुभव अपना, सच हरि भजन जगत सब सपना। क्‍यों कहना पडता है ?  या भुशुंडि भगवान -  नट मरकट इव सबहि नचावत, राम खगेस बेद अस गावत- क्‍यों कहना पडता है? सूर्य निकलता -अस्‍त होता है। हवा चलती ,बादल बरसते हैं। आपदायें-प्राकृतिक विपदायें आती हैं। धरती अनुकूल -प्रतिकूल  परिस्थिति में लहलहाती -सूखती है। सब एक गतिमान कर्म-चक्र में बंधे चकर घिन्‍नी खाते हैं। हम बिचारों के कर्म की क्‍या बिसात ? गीता का कर्मयोग \'गहना कर्मणा गति:\' और \' कवयोप्‍यत्र मोहिता:\' कहता है। कर्म की गति बडी गहन है और बडे बडे पंडित भी कर्म स्‍वरूप को लेकर मोहित हैं। फिर फलेच्‍छा न करने से कर्म के प्रति परवाह का क्‍या अर्थ ?

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पुराने ज़माने में लड़की को दहेज इस लिए दिया जाता था क्यूंकि उसका पिता की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं होता था तो उसको उसके हक की संपत्ति नगत रूप में या सामान के रूप में दे दी जाती थी | जिसकी जितनी हैसियत होती थी उतना वो अपनी बेटी को दे देता था | मगर समाज में दिखावे का जो दौर शुरू हुआ उसमे एक आम भारतीय पिस के रह गया दिखावे में किसी सक्षम ने अपनी बेटी को बहुत दिया इतना की सारे लोगो की आँखे फैल गयी इतना हमको भी मिलना चाहिए यहीं से बोली लगाने वालो की शुरुवात हो गयी | मन मुताबिक मिला तो ठीक नहीं तो लड़की के साथ हिंसा उससे भी बढ़ के हत्या | माँ बाप बढती उम्र की लड़की को घर में बैठा नहीं सकते तो कर्ज में डूब के सुरसा का मुह भरते रह जाते है | आप ने कहा लड़की को लायक बनाईये वो स्वयं ही दहेज़ है सही कहा आप ने अब नया दौर है वही लड़की को माँगा जाता है जो नौकरी पेशा होती है क्यूँ की उम्र भर का जो दहेज़ मिल रहा है उसके सेलरी के रूप में | दहेज़ का अंत होना चाहिए कोई विकल्प नहीं | लड़कियों को लायक बनाया जाना अच्छी बात है | मगर अब देखा ये जा रहा है की उन्ही लडकियों के घर रिश्ते की बात चलती है जो जॉब करती है | ये दहेज़ का नया रूप है |

के द्वारा: div81 div81

प्रीति जी , उपरोक्त उदाहरण पढ़ कर यह कहना चाहूंगी की माँ के लिए कोई भी संतान ,बेटा हो या बेटी सामान ही हैं परन्तु बेटी के लिए अधिकाँश माता-पिता की मानसिकता वही है l दहेज़ मांगने वाले की बात तो समझ में आती हैं लेकिन उन माता -पिता को क्या कहेंगे जो अपनी बेटी के साथ-साथ दहेज़ में मांगे गए ढेरो सामान तथा नगदी भी देते हैं l शायद यह सोचकर की ससुराल वाले उसे खुश रखेंगे l पहले इस सोच को बदलने की आवश्यकता हैं l क्योंकि आज की तारीख में बेटिया, बेटो से बढ़कर कार्य कर दिखाने में सक्षम हैं l साथ ही उन्हें काबिल बनाने में भी उतना ही खर्च होता हैं l हाँ खाना बनाने वाली बात पर यह कहना चाहती हूँ की इस गुण को नहीं भूलना चाहिए l

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विज्ञान यह भी कहता है कि जब हम प्रकाश की गति से चलेंगे तो हमारी लंबाई शून्य एवं वजन अनन्त हो जाएगा। अत: यह सिर्फ गणितीय गुणा भाग के सिवा कुछ नहीं है। श्वास गति को रोकना या टालना विज्ञान के वश में आज भले ही न हो, कल हो भी सकता है। विज्ञान की परिभाषा जो मैंने पढ़ी है-किसी भी विषय के क्रमबद्घ ज्ञान को विज्ञान कहते हैं। इस दृष्टि से कोई भी विषय, चाहे हो वह अध्यात्म हो, विज्ञान ही है। आज से कुछ दशक पहले जो चीजें असम्भव थीं आज वह यथार्थ है। रहा सवाल स्वमेव व स्वचालित तरीके का। तो भगवान कृष्ण ने जब यह कहा है कि फल ईश्वर के हाथ है तब यह भी कहा है कि मनुष्य धर्मानुसार कर्म करे, यही कर्मयोग है। हम यदि यह मानने लगेंगे कि सब कुछ स्वचालित है तो कर्म की प्रेरणा के खोने का खतरा पैदा हो जाएगा। अतएव हमें अपने कर्मों पर ध्यान देते हुए ईश्वर द्वारा प्रदत्त समय का समुचित उपयोग करते रहना चाहिए। मनुष्य जीवन तभी सफल हो सकता है। आना या जाना जब हमारे हाथ ही नहीं तो हम उसकी परवाह ही क्यों करें?

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 समय ही जीवन है। समय का भरपूर सदुपयोग -सम्‍यक प्रबंधन जवीन को समृद्ध बनाया जा सकता है। लेकिन, प्राय: हमें इसके महत्‍व का अंदाज भी समय पर नहीं हो पाता। ब्‍यकित तब जीवन में आता है तो उसके पास एक कालावधि का बैंक बैंलेंस होता है जो हर श्‍वास के साथ घटता जाता है। और यह कब खत्‍म हो गया या होने वाला है अक्‍सर पता ही नहीं चलता। गयी श्‍वास वापस लज्ञटायी नहीं जा सकती और एक श्‍वास बढायी नहीं जा सकती। जब जागे तभी सवेरा ।समय के प्रति वास्‍तविक जागरूकता (जागरूक होने पर ही सदुपयोग संभव है) तो भगवान गुह को बताते हैं-  मोह निशा सब सोवनि हारा ,देखिय सपन अनेक प्रकारा। एहि जग जामिनि जागहि जोगी, परमारथी प्रपंच वियोगी। जानिय तबहिं जीव जब जागा, जब सब बिषय विलास विरागा।  होइ विवेक मोह भ्रम भागा, तब रघुनाथ चरन अनुरागा। सखा परम परमारथ एहू, मन क्रम बचन राम पद नेहू।

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